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एजुकेशन लोन लेने से पहले इसे जरूर जान लें

Posted On: 2 Jul, 2013 बिज़नेस कोच में

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आज की इस महंगाई में बच्चों की उच्च शिक्षा माता-पिता की सबसे बड़ी समस्या होती है. आज की डेट में हर अच्छी नौकरी के लिए एमबीए, इंजीनियरिंग तो आम हो चुका है. इसके अलावे भी वोकेशनल कोर्सेस की ज्यादा मांग है क्योंकि यह आम कोर्सेस के मुकाबले नौकरी पाने के लिए ज्यादा मुफीद माने जाते हैं. प्रतियोगिता बहुत ज्यादा है और चाह भी बहुत ऊंची है. आपका बच्चा एक साधारण कॉलेज से भी एमबीए करता है तो भी कम से कम 4 से 7 लाख का खर्च तो पड़ ही जाता है. जिनके पास साधन हैं, उनके लिए तो यह कोई मायने नहीं रखता, लेकिन जो इतना खर्च वहन करने में सक्षम नहीं हैं उनके लिए यह बहुत बड़ी परेशानी होती है.



पैसों की कमी से कोई भी मां-बाप अपने बच्चों का भविष्य खराब नहीं करना चाहते. इतनी बड़ी राशि किसी से कर्ज लेना भी संभव नहीं होता. ऐसे में मां-बाप के पास एक ही उपाय बचता है, और वह है बैंक लोन. आजकल लोन लेकर पढ़ाई करना लगभग ट्रेंड बन चुका है. मध्यम वर्गीय ज्यादातर परिवार बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए बैंक से लोन लेकर पढ़ाई का खर्च वहन कर रहे हैं. पर बिना सही जानकारी के किसी भी बैंक से लोन लेना घाटे का सौदा साबित हो सकता है.

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आज बहुत से सरकारी, प्राइवेट बैंक शिक्षा ऋण की सुविधा उपलब्ध करवा रहे हैं. पर ज्यादातर लोग बस ऋण मिल जाने से ही खुश हो जाते हैं. बैंक की सभी शर्तें मानना जाहिर है उनकी मजबूरी है पर ज्यादातर लोग उन शर्तों से वाकिफ भी नहीं होते. यह जरूर है कि बैंक से ऋण लेने के लिए उनकी सभी शर्तें पूरी करना उन्हें मानना आपकी मजबूरी है पर उसी बैंक से आप ऋण लें यह जरूरी नहीं. सभी बैंकों की शर्तें, ऋण की राशि पर ब्याज दर, ऋण चुकाने की समय सीमा, समय सीमा के अंदर ऋण न चुका पाने की स्थिति में ब्याज बढ़ने की दर आदि अलग-अलग होते हैं. ऐसे में अगर आप बैंक की शर्तों के प्रति असुरक्षित महसूस करते हैं तो किसी और बैंक की तरफ रुख कर सकते हैं.



आदित्य सक्सेना ने बेटे के एमबीए के लिए 7 लाख किसी प्राइवेट बैंक से शिक्षा ऋण लिया. ऋण की प्रक्रिया पूरी करते हुए उन्होंने ऋण चुकाने की शर्तों पर ध्यान नहीं दिया. उसमें पढ़ाई के खत्म होने के तुरंत बाद से ऋण चुकाने की शर्त थी. ऐसा न करने की स्थिति में ऋण पर ब्याज बढ़ा दिया जाता. मि. सक्सेना और उनके बेटे को यह बात तब पता चली जब बैंक का नोटिस उन्हें मिला. उनके बेटे को पढ़ाई खत्म करने के एक साल बाद एक प्राइवेट फर्म में नौकरी मिली, उसमें भी वह शुरुआत में ही ऋण चुका सकने की अवस्था में नहीं था. आज मि. सक्सेना और उनके बेटे के लिए ऋण पर ब्याज की बढ़ती हुई दर एक सरदर्द बन चुकी है.

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पढ़ाई के लिए बैंक से ऋण लेने वाले कई अभिभावकों और युवाओं के साथ ऐसी स्थिति आती है. इसलिए बहुत जरूरी है कि ऋण लेने से पूर्व कुछ बातों का ध्यान रखा जाए:


ब्याज दर: शिक्षा ही नहीं कोई भी ऋण लेने से पहले उस पर लगने वाला ब्याज दर सबसे महत्वपूर्ण होता है. कई बैंक अपनी ब्याज दरें लोन की राशि पर तय करते हैं, तो कई बैंकों में ऋण की ब्याज दरें फिक्स होती हैं. इसलिए ऋण की सभी औपचारिकताएं पूरी करने से पूर्व ही आप बैंक की ब्याज दरों की पॉलिसी का पता कर लें. इसके साथ ही ऋण चुकाने की अवधि तथा तथा समय सीमा की भी पूरी जानकारी पहले ही कर लें. कई बैंक पढाई खत्म होने के तुरंत बाद ही ऋण के किश्तों की शुरुआत कर देते हैं. कुछ बैंक नौकरी लगने के बाद एक साल तक का समय देते हैं. तब तक ब्याज नहीं लगता. ऐसे ऋण प्लान बच्चों को भी तनाव मुक्त रखते हैं और आपको भी.


अन्य शुल्क: ऋण पर ब्याज दरें तो बाद की बात हैं, पर इसके अलावे भी प्रोसेसिंग फीस, डॉक्यूमेंटेशन शुल्क और एड्मिनिस्ट्रेशन शुल्क आदि भी कभी-कभी काफी खर्चीला साबित होता है. अत: ऐसे किसी छुपे हुए शुल्क की जानकारी पहले ही ले लें.

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छूट की अवधि: छूट की अवधि से अर्थ है बैंक से लिए इस ऋण को चुकाने का शुरुआती समय. मतलब अगर आपने 2 या तीन साल के एमबीए या किसी और पढ़ाई के लिए ऋण लिया है, तो जाहिर है पढ़ाई की अवधि तक तो आप ऋण चुका नहीं सकते. ऐसे में कई बैंक पढ़ाई खत्म होने के बाद समय तय करते हैं जब से इसके ऋण चुकाने के किश्तों की शुरुआत होती है और तय समय पर किश्त न चुकाने से ब्याज बढ़ता है. कई बैंक पढाई खत्म होने के तुरंत बाद यह समय रखते हैं, जबकि अधिकतर बैंक नौकरी लगने के बाद यह समय देते हैं. नौकरी के लिए वह आपको छ: महीने या एक साल का समय भी देते हैं. यह अभिभावक तथा युवा ऋणधारी दोनों के लिए ही उपयोगी है. इस पर जरूर ध्यान देना चाहिए. कई बार ऐसा होता है कि ऋण लेने के वक्त अभिभावक इस पर ध्यान नहीं देते. नतीजा यह होता है कि पढ़ाई के तुरंत बाद बच्चे और मां-बाप के सामने नौकरी की शुरुआत में ही ऋण चुकाना संभव नहीं होता. पर ऐसी स्थिति में ऋण की बढ़ती ब्याज दरें उनके लिए तनाव का कारण बन जाती हैं. ऐसे में यह ऋण सुविधा की जगह बोझ बन जाता है.


मार्जिन राशि: अधिकांश बैंक कोर्स फीस की राशि का केवल 80 से 95 प्रतिशत राशि ही ऋण स्वरूप देते हैं. बाकी के 5 से 20 प्रतिशत कोर्स फीस का भुगतान आपको खुद ही करना होता है. मतलब अगर कोर्स की कुल फीस 8 लाख है तो बैंक आपको 6.5 से 7 लाख तक की राशि ही ऋण देगा. बाकी के 1 से डेढ़ लाख रुपयों का इंतजाम आपको खुद ही करना पड़ता है. इसलिए ऋण लेने से पहले यह निश्चित कर लें कि बैंक आपको कितना ऋण देगा और आपको खुद कितनी राशि की व्यवस्था करनी है.


कोलैटरल (Collateral): अधिकतर 4 लाख से अधिक की ऋण राशि पर बैंक कोई सिक्योरिटी या गारंटर मांगते हैं. सिक्योरिटी स्वरूप नकद राशि, जमीन, मकान, म्यूचुअल फंड या कोई इंश्योंरेंस पॉलिसी भी दी सकती है जबकि गारंटर ऋण न चुका पाने की स्थिति में बैंक के दंड का भुगतान करने के लिए जिम्मेदार होगा.


किसी भी प्रकार का ऋण आपको जिंदगी भर की सुरक्षा नहीं देता. हां, यह जरूर है कि उस समय में पैसे के अभाव में पढ़ाई या अन्य बेहद जरूरी कामों को रुकने से बचाता है. पर ऋण मिल गया तो आप निश्चिंत हो गए ऐसा नहीं है. ऋण मिलने से ज्यादा उसे चुकाना कई बार जटिल प्रक्रिया बन जाता है. अत: ऋण के लिए बैंक चुनने के लिए अपनी आर्थिक और पारिवारिक क्षमता को ध्यान रखते हुए जागरुक रहना बहुत जरूरी है. अगर आप जागरुक हैं तो यह ऋण आपके लिए तनाव की बजाय खुशियों की चाबी साबित होता है, इसमें कोई शक नहीं.

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