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इस तरह से इंटरनेट की दुनिया का हिटलर बनने की फिराक में है फेसबुक!

Posted On: 4 Jan, 2016 Business में

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इंटरनेट उस खुली जमीन की तरह है जिस पर कब्ज़ा करने की होड़ में सभी इंटरनेट आधारित व्यवसाय चलाने में लगे हुए हैं. जो जितना बड़ा है, वो उस पर कब्ज़ा करने के लिये उतना ही दम-खम लगा रहा है. कई दशकों तक सर्च इंजन के रूप में गूगल की बढ़त को टक्कर देने के लिये फेसबुक भी कमर कस चुका है. विकासशील और अविकसित देश फेसबुक के मालिकों जैसी सोच रखने वालों के लिये बड़ा इंटरनेट बाजार है जिस पर नियंत्रण के लिये सभी लालायित हैं. इसी सोच को केंद्र में रखते हुए फेसबुक ने भारतीय इंटरनेट बाजार पर आधिपत्य स्थापित करने के लिये पहले इंटरनेट. ओआरजी जैसा झाँसा दिया. इसके सफल न होने पर उसी सोच को नाम परिवर्तन (फ्री बेसिक्स) के साथ इंटरनेट यूजर्स को झाँसा देने का प्रयास कर रही है.


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मान लीजिये कि एक ब्लॉगर एक पब्लिक नेटवर्किंग साइट चलाता है जिसकी आय अरबों-खरबों में है. यह पब्लिक नेटवर्किंग साइट इंटरनेट आधारित है. इस साइट से जुड़े हुए लोगों के उस पर ब्राउज करने, लाइक्स, कमेंट, तस्वीर साझा करने से ब्लॉगर की आय में वृद्धि हो रही है. इंटरनेट मुफ्त है तो बहुत सारी वैबसाइट बनेगी जिन पर लोग अपनी सुविधानुसार आ-जा सकेंगे. अब मान लीजिये, यह ब्लॉगर कहे कि जो भी ग्राहक इंटरनेट की यात्रा करना चाहे वो यात्रा करे लेकिन वहीं-वहीं जहां मैं कहूँ! तो आपको कैसा लगेगा?  क्या 21वीं शताब्दी में भी हम इतने फ्री नहीं हुए हैं कि कोई आये और हमारे कहीं आने-जाने पर रोक-टोक करे? ऐसा तो है नहीं कि फेसबुक के आने से पहले लोग इंटरनेट यूज नहीं करते थे.


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ये तो इंटरनेट यूजर्स ही तय करेंगे कि उन्हें नेट निरपेक्षता चाहिये या कोई इंटरनेट-डिक्टेटर. ये तय करने से पहले फ्री-बेसिक्स के पक्ष और विपक्ष में दिये गये तर्कों पर गौर कर लें-

फ्री बेसिक्स के समर्थन में लोगों को लाने के लिये अपने विज्ञापन में फेसबुक ‘फ्री, बेसिक इंटरनेट’ और “फ्री बेसिक्स” की अदला-बदली कर प्रयोग कर रही है जिससे ऐसा महसूस होता है कि इंटरनेट फेसबुक की निजी सम्पत्ति है. यह भारतीय विज्ञापन कानूनों का साफ उल्लंघन है जो ब्रांड या उत्पादों के लिये जेनरिक शब्दों के इस्तेमाल पर रोक लगाती है.


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यह फेसबुक के स्वामियों का दोगलापन है कि वो अमेरिका में नेट निरपेक्षता के समर्थन में खड़े हैं और भारत जैसे उभर रहे देशों में इंटरनेट पर एकाधिकार स्थापित करने के लिये 100 करोड़ से ज्यादा की राशि विज्ञापनों पर खर्च कर रहे हैं. तो अगर, आप फेसबुक यूजर हैं और बिना देखे-सुने फेसबुक पर फ्री बेसिक अभियान के समर्थन में खड़े हो रहें हैं तो जरा ठहर कर एक नजर इस ब्लॉग पर भी फिरा लीजिये. इस अभियान को आप सबके देखे-सुने-समझे बिना किया गया हर सपोर्ट फेसबुक, दूरसंचार नियामक(ट्राई) के पास ले जायेगा और जनसमर्थन की बात कहकर अपनी बात मनवाने का दबाव सरकार पर बनायेगा. Next….


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